कामायनी - जयशंकर प्रसाद ('निर्वेद' परिच्छेद के कुछ छंद)

"तुमुल कोलाहल कलह में

मैं ह्रदय की बात रे मन

विकल होकर नित्य चचंल,

खोजती जब नींद के पल,


चेतना थक-सी रही तब,

मैं मलय की बात रे मन

चिर-विषाद-विलीन मन की,

इस व्यथा के तिमिर-वन की लृ


मैं उषा-सी ज्योति-रेखा,

कुसुम-विकसित प्रात रे मन

जहाँ मरु-ज्वाला धधकती,

चातकी कन को तरसती,


उन्हीं जीवन-घाटियों की,

मैं सरस बरसात रे मन

पवन की प्राचीर में रुक

जला जीवन जी रहा झुक,


इस झुलसते विश्व-दिन की

मैं कुसुम-श्रृतु-रात रे मन

चिर निराशा नीरधार से,

प्रतिच्छायित अश्रु-सर में,


मधुप-मुखर मरंद-मुकुलित,

मैं सजल जलजात रे मन"

उस स्वर-लहरी के अक्षर

सब संजीवन रस बने घुले।